एक कैदी की डायरी -41

jail diary, kaidi ki diary, vradhgram, harminder singh, gajraulaहम जानते हैं कि प्रेम की ताकत अद्भुत होती है। वह मनों को जोड़े रखता है और इंसान इंसान से जुड़ता चला जाता है। प्रेम एक डोर है जिसकी मजबूती यह कहती है कि समय उसे निरंतर पक्का कर रहा है। जब भावों में रिश्ते बनते हैं तो उनकी ताकत को नापा नहीं जाता, वह स्वत: ही प्रकट हो जाती है......

लाजो की एक सेहली थी जिसका नाम लक्ष्मी था। सब उसे लछमी कहकर पुकारते। उसे इसपर कोई आपत्ति नहीं थी। कई बच्चे उसे चिढ़ाते थे। मैंने ऐसा कभी नहीं किया। लाजो को लक्ष्मी से बड़ा प्रेम था। वह उसपर जान छिड़कती थी।

लक्ष्मी और लाजो की मित्रता कमाल की थी। लक्ष्मी चुपचाप रहती थी लेकिन लाजो थोड़ा बहुत बोल भी लेती, लेकिन उनका लगाव बहुत पक्का था। जब वे स्कूल में होतीं तो साथ-साथ रहतीं।

मैं उन्हें देखा करता। मुझे प्रसन्नता होती कि वे कितने प्रेम से रहती हैं। हम जानते हैं कि प्रेम की ताकत अद्भुत होती है। वह मनों को जोड़े रखता है और इंसान इंसान से जुड़ता चला जाता है। प्रेम एक डोर है जिसकी मजबूती यह कहती है कि समय उसे निरंतर पक्का कर रहा है, टूटने की बात वहां कैसे ठहर सकती है। जब भावों में रिश्ते बनते हैं तो उनकी ताकत को नापा नहीं जाता, वह स्वत: ही प्रकट हो जाती है।

लक्ष्मी का हृदय जब गुड़ हो जाता तो लाजो उससे चिपक जाती। उसी तरह लाजो कभी मिसरी हो जाती, कभी गुड़। लक्ष्मी की आदतों का संग्रह किया जाए तो मैं कहना चाहूंगा कि वह नटखट बिल्कुल नहीं थी। उसका हृदय एकदम शांत था। यों कहा जाए तो उसका हृदय मोम था नीरा। वह एक मासूम लड़की की तरह थी जो शायद अपने आसपास क्या हो रहा है, नहीं जानती थी या जानने की उसे चाह नहीं थी।

लक्ष्मी का चेहरा सुन्दर था। उसके चेहरे पर मैं कविता लिख सकता था। उसकी आंखें मोटी थीं जो उसकी हंसी के साथ दमकती थीं। बालों को संवारने की कला का उसने गहन अभ्यास किया हुआ था। जैसा कि आमतौर पर लड़कियां बालों की चोटी बनाती हैं, फिर उसमें रिबन सजाती हैं। वह ऐसा नहीं करती थी। वह कहती,‘मैं अपने बालों का ख्याल रखती हूं। पीछे की एक चोटी पर छोटा गजरा बांधना मुझे अच्छा लगता है।’ उसे जो देखता उसकी सादगी में खो जाता, मैं भी।

मैं उसके चेहरे को पढ़ने की कोशिश करता। उसकी धीमी आवाज मुझे अच्छी लगती। बिल्कुल कोमल फूल की तरह थी वह जिसकी पंखुड़ियां ओस की एक बूंद से ही नम हो जातीं। उसकी बोली मन को छूती। जब वह मुस्कराती तो मैं उसे देखता रह जाता। चूंकि वह लाजो के साथ रहती इसलिए मेरी मुलाकात उससे होती रहती। पर वह शर्मीले स्वभाव की थी जिस कारण वह मेरे सामने सहज नहीं थी। मैं उससे घंटों बातें करना चाहता था। मेरा स्वभाव प्रारंभ से शर्मीला रहा है और बचपन में मैं घबराता था, खासकर लड़कियों के सामने। अपने शिक्षकों के सामने मैं चुपचाप रहता और जरुरत पड़ने पर भी कई बार सोचना पड़ता कि क्या बोलूं? कैसे बोलूं? पहले विचारों से लड़ता, फिर कहने की हिम्मत जुटाता।

जारी है....

-Harminder Singh




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